हरिद्वार।
पिछले दिनों दिल्ली से हरिद्वार तक माहौल शिवमय था। गाहे-ब-गाहे अन्य शहरों से भी लोग बोल बम के नारों से धरती आकाश गुंजायमान करते कांवड़ लेकर हरिद्वार पहुंच रहे थे। भगवा रंग, ज़बरदस्त डीजे और जगह जगह कांवड़ शिविर सावन को विशेष बना रहे थे। हरिद्वार में आस्था का सैलाब , मां गंगा के तट पर उमड़ा पड़ा था। तिल भर जगह न थी। सरकारों से लेकर शासन, प्रशासन और पुलिस सभी के हाथ पांव फूले हुए थे। शिवभक्तों के लिए हर सम्भव इंतज़ाम किए गए थे। खाना, सोना, दवाई व अन्य सुविधाएं अव्वल नम्बर थीं। क्या नज़ारा था ,जब थके हुए कावंड़ियों पर हरिद्वार पहुंचते ही सरकार गुलाब के फूल बरसा रही थी। एक तो माँ गंगा की गोद मे पहुंचने की खुशी और उस पर पुष्पवर्षा,किसी किसी अलौकिक आनंद से कम न थी। छिटपुट घटनाएं भी हुईं, लेकिन पुलिस और प्रशासन ने सजगता से शिव का जलाभिषेक करवाया और भोले कि भक्ति का ये पर्व शांति पूर्वक निपटा।

अब कांवडिए अपने अपने घर हैं। अब पुष्पवर्षा वाले पर्व का एक दूसरा और भयावह चेहरा सामने है। दिल्ली से हरिद्वार तक लजे कांवड़ शिविर अस्त-व्यस्त पड़े हैं। कूड़ा और गंदगी सड़क किनारे खूब है। प्लास्टिक के गिलास और प्लेट आदि जहां- तहां छितराए हुए हैं।

इस पूरे रास्ते को पार कर जब आप हरिद्वार पहुंचते हैं, तो नज़ारा और भी अजीब है। जहां कुछ दिनों पहले आस्था का सैलाब था और तिल रखने की भी जगह न थी,वहां आज कूड़े और गंदगी का अम्बार लगा हुआ है। इतना गंदे कपड़े , प्लाटिक की थैलियों और अन्य तमाम तरह के कूड़े के चलते यहां आज भी तिल रखने की जगह नहीं है।

कौन है ज़िम्मेदार:
इतने कूड़े और कबाड़ से न सिर्फ गंगा नदी दूषित हो रही है ,बल्कि वहाँ अन्य बीमारियों का भी खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किसकी गलती है? ख़या हर गलती को सरकार और प्रशासन पर थोप देना ही आदत है या फिर आस्था और विश्वास के इस पवित्र धाम पर पहुंचने वाले लोगों की भी ज़िम्मेदारी बनती है।

मन में शिव को बसाए यहाँ पहुंचे शिवभक्त ये क्यों नहीं समझ पाए कि जहां कूड़ा फैलाकर जा रहे हैं , वो मां गंगा स्वयं उन्हीं भगवान भोले की शिरोधार्य हैं। आज जो नजारा हरिद्वार और आस-पास दिख रहा है, वो सिर्फ और सिर्फ हमारी अनदेखी और मनमानी का नतीजा है। पुष्पवर्षा के जवाब में ये शिवभक्तों की सौगात हानिकारक है।