Friday, April 4, 2025
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मंदिर , जहां 800 साल पहले मुस्लिम की ज़मीन से निकला था शिवलिंग, हल लगते ही पिण्ड से निकलने लगी थी खून और दूध की धार

by POOJA BHARTI
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सहारनपुर।

आज देश भर के शिवालयों में शिवभक्तों की खासी भीड़ है। ‘बोल बम’ के जयकारों से मंदिर गुंजायमान हैं। कावड़ यात्रा अपने अंतिम पड़ाव पर है। सभी भक्त भगवान भोले का जलाभिषेक कर रहे हैं। ऐसे में एक मंदिर ऐसा भी है कि जहां भक्तों की भीड़ बताती है कि यहां आस्था और विश्वास बहुत अधिक है। किवदंतियों की माने तो इस मंदिर में भगवान शिव भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। 

हम बात कर रहे हैं मनकेश्वर महादेव मंदिर की। इसका इतिहास 800 साल पुराना है। आपने मनकेश्वर महादेव मंदिर न केवल अपनी प्राचीनता बल्कि शिव भक्तों के लिए अपनी आस्था का केंद्र होने के कारण भी महत्वपूर्ण है। ख़ास बात ये है यह सिध्दपीठ मंदिर मुस्लिम किसान के खेत में बना हुआ है और यहां स्वंमभू शिवलिंग स्थापित है। जिसके चलते यह मंदिर हिंदू मुस्लिम एकता की इबारत लिख रहा है। 

आपको बता दें कि फतवों की नगरी देवबंद से करीब 5 किलोमीटर दूर मानकी गांव में करीब 800 साल पुराना प्राचीन मंदिर है। जिस जमीन में यह मंदिर बना है वह जमीन कभी मुस्लिम किसान की हुआ करती थी। बताया जाता है कि खेत की जुताई करते वक्त हल के आगे शिव पिंडी आने से खून की धार निकल आई थी। लेकिन किसान ने दूसरी बार हल चलाया तो पत्थर जैसी चीज अड़ने से दूध की धार बहने लगी। जिसे देखकर मुस्लिम किसान बेहोश हो गए थे। जब जानकार लोगों ने उन्हें स्वंमभू शिवलिंग होने के बारे में बताया तो मुस्लिम किसान ने अपनी 17 बीघा जमीन इस मंदिर को दान दे दी। वहीं उसी रात देवबंद के एक गुप्ता परिवार के सपने में दर्शन देकर भोलेनाथ ने इस जगह पर मंदिर स्थापित करने को कहा। 

जिसके बाद निसंतान गुप्ता जी ने मानकी गांव में मंगलौर मार्ग पर मुस्लिम किसान की जमीन में भव्य मंदिर का निर्माण किया। मानकी गांव में मंदिर बना तो इस मंदिर का नाम सिध्दपीठ मनकेश्वर महादेव पड़ गया। देवबंद से करीब चार किमी दूरी पर स्थित श्री मनकेश्वर महादेव मंदिर में प्रदेश ही नहीं अपितु अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए माथा टेकने स्वयंभू प्रकट शिवलिंग के दर्शन को मानकी गांव में आते हैं। मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना होने के साथ ही अपने अंदर विभिन्न प्रकार की चमत्कारिक घटनाओं को समेटे हुए है। मंदिर के स्थापित वाली भूमि गाड़ा बिरादरी के एक मुस्लिम परिवार की थी। सोमवार के दूसरे दिन इस मंदिर में आसपास के सैकड़ों गाँव से आये शिव भक्तो ने जलाभिषेक कर मन्नते मांगी। 

सिद्धपीठ के महंत राजपाल सिंह, सुभाष बताया कि भगवान शिव ने मंथन के दौरान मानकी गांव में आसन लगाने के उपरांत नीलकंठ महादेव मंदिर में आसन लगाया गया था। मंदिर पुजारी के मुताबिक़ पवित्र धरती से स्वयंभू ज्योर्तिलिंग प्रकट हुए हैं। मंदिर के पुजारी के अनुसार आपसी सौहार्द बढ़ाने के लिए 36 वर्ष पूर्व गांव के प्रधान अल्लादिया ने मंदिर को ओर तीन बीघा भूमि जमीन दान दी थी। इतना ही नहीं सिद्धपीठ पर प्रतिवर्ष श्रावण की चतुर्दशी तिथि का विशाल मेला आयोजित किया जाता है। जहां पर सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु ही नहीं बड़ी संख्या में कांवड़िएं भी भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं।

सावन का महीना शिव भक्तों के लिए विशेष होता है और सोमवार को भगवान शिव को समर्पित किया जाता है। इस दिन मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ना इस बात का प्रमाण है कि लोगों की आस्था कितनी गहरी है। जलाभिषेक शिव पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भक्तों द्वारा जलाभिषेक करना भगवान शिव को प्रसन्न करने का एक तरीका माना जाता है।

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